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नदीगाथा


नदीगाथा


Posted By: Ameeta  |  Posted Date: 02-10-2025

   नदियां जीवनदायिनी होती हैं। नदी किनारे ही इंसान जन्मा है और नदियों के किनारे ही दुनिया की सभी सभ्यताएं व संस्कृतियां फली-फूली हैं। धरती में नदियों के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन जलवायु परिवर्तन,बढ़ती आबादी और नदियों के प्रति आम लोगों की उदासीनता के चलते धरती में जल संकट तो गहराया ही है,अब नदियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसलिए नदियों का न केवल संरक्षण जरूरी है बल्कि हमें अपनी नई पीढ़ियों को इनके प्रति संवेदनशील भी बनाना जरूरी है ताकि इनका अस्तित्व बचा रहे और धरती में इंसानी सभ्यता व संस्कृति भी हमेशा की तरह फलती-फूलती रहे। इन दूरगामी मानवीय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु नदीगाथा मासिक कालम के तहत प्रस्तुत है इस बार नाॅर्थ-ईस्ट की  दूसरी प्रमुख नदी, बराक नदी पर विशेष गाथा।,

   ब्रह्मपुत्र के बाद बराक नदी पूर्वोत्तर भारत की दूसरी महत्वपूर्ण नदी है। इसका क्षेत्र, जल प्रवाह और आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में उतना ही गहरा प्रभाव है, जैसे ब्रह्मपुत्र नदी का है। यह मणिपुर से निकलती है और असम की बराक घाटी से होकर बहती है। शायद ही कोई ऐसा साल जाता हो, जब मानसून के मौसम में यहां सबसे पहले बाढ़ न आती हो और हफ्तों तक बार-बार बराक घाटी का नाम समाचारों में सुनने को न मिलता हो। बराक घाटी से आगे बढ़कर यह बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है और वहां यह मेघना नदी घाटी तंत्र का हिस्सा बन जाती है। असम के कछार सिलचर की इसे जीवनरेखा कहते हैं। ब्रह्मपुत्र से भी ज्यादा पूर्वोत्तर के कृषि जीवन में इसका योगदान है। बराक नदी के बारे में कहा जाता है कि यह केवल एक जलधारा नहीं है बल्कि एक जीवंत सभ्यता, संस्कृति और पारिस्थितिकी का आधार है। 

   मणिपुर में जहां बराक नदी का जन्म होता है, वहां यह छोटी-छोटी धाराओं के रूप मंे आगे बढ़ती है और फिर आगे चलकर एक विशाल नदी का रूप ले लेती है। इसकी कुल लंबाई 900 किलोमीटर है और इसका प्रवाह क्षेत्र मणिपुर, मिजोरम और असम है। बांग्लादेश में घुसने के बाद यह दो धाराओं में बंट जाती है। एक सूरमा और दूसरा कुशियारा। जब यह मेघना नदी घाटी तंत्र का हिस्सा बनकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है, उस समय यह भारत और बांग्लादेश के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय जलधारा का रूप ले लेती है। बराक नदी भले गंगा या गोदावरी तरह बहुत लंबी न हो, लेकिन इसका पारिस्थितिकी महत्व इनसे कुछ कम नहीं है। बराक नदी का बेसिन जैव-विविधता का सबसे समृद्ध घर है। घने वनों, वेटलैंड और बाढ़ तथा मैदानों से भरपूर बराक नदी दर्जनों किस्म की मछलियां, सैकड़ों किस्म के बहुरंगी पक्षियों और मीठे अन्न की उपजाऊ फसलों की समृद्ध विरासत की मालिक है। जब इस नदी में बाढ़ आती है, जो इसकी सबसे नियमित प्राकृतिक घटना है, तो यह जितना प्रत्यक्ष नुकसान करती है, उससे कई गुना ज्यादा अपने साथ उर्वर मिट्टी लाकर समृद्ध खेती का जरिया बनती है।

   हालांकि हाल के दशकों में बराक नदी को कई तरह के मानवीय विध्वंसों से गुजरना पड़ा है। बहुत बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, अतिक्रमण और जल प्रदूषण के कारण इस नदी की पारिस्थितिकी को बहुत ज्यादा चुनौती मिली है। फिर भी आर्थिक और जनजीवन में इसकी भूमिका कम नहीं हुई। असम के लाखों लोगों के जीवन जीने का यह मुख्य आधार है। धान, जूट और सब्जियों की खेती इस नदी के उर्वर मिट्टी की देन है। 

   बाढ़ के कारण यह हर साल जो उपजाऊ मिट्टी लेकर आती है, वह एक तरह से उत्तर पूर्व का खाद्यान्न भंडार भरती है। असल में यह नदी जल परिवहन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस तरह बराक नदी केवल जल का नहीं बल्कि रोजगार और आर्थिक स्थिरता का भी स्रोत है। जहां तक इसके सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व की बात है, तो बराक घाटी की संस्कृति इस नदी के बिना अधूरी है। स्थानीय लोकगीतों, कहानियों और परंपराओं मंे इसका विशेष स्थान है। नदी के किनारे बसे गांवों में त्योहारों को अकसर मेलों का आयोजन होता है, जो जल और प्रकृति दोनो के प्रति आस्था और श्रद्धा का आधार हैं। 

   बराक नदी के किनारे बंगाली और दूसरे समुदायों का निवास है, जिनकी यह सांस्कृतिक पहचान में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है। इतिहास में बराक नदी उत्तर पूर्व को अन्य क्षेत्रों से जोड़ने का महत्वपूर्ण काम किया था। प्राचीन और मध्यकाल में यह व्यापारिक मार्ग रही है। क्योंकि इस काल में चाय और दूसरे उत्पादों के परिवहन के लिए इसका उपयोग किया जाता रहा है। सिलचर जैसा सांस्कृतिक शहर इसी नदी के किनारे विकसित हुआ है। इस तरह देखें तो बराक नदी केवल भौगोलिक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक संपर्क का भी माध्यम रही है। लेकिन आज यह उत्तर पूर्व की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण नदी कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही है। इसमें प्रदूषण बहुत अधिक है, अवैध रेत खनन माफिया के यह चंगुल में फंसी है और जलवायु परिवर्तन के कारण इसकी बाढ़ दिन पर दिन अनियमित होती जा रही है। जिस कारण हर साल लाखों लोग विस्थापित होते हैं और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। 

   यदि समय रहते इस महत्वपूर्ण नदी का संरक्षण न हुआ तो यह जीवनरेखा संकट में पड़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि नदी किनारे गहन वृक्षारोपण हो। प्रदूषण नियंत्रण हो, सतत कृषि और मत्स्य पालन की सुविधा विकसित हो, बाढ़ और प्रबंधन की आधुनिक तकनीक तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी है। बराक नदी उत्तर पूर्व की उस धड़कन की तरह है, जो दिन रात बहते हुए लाखों लोगों को जीवन देती है। यह केवल एक नदी नहीं बल्कि एक जीवित परंपरा है। एक संस्कृति और सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है। 


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